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admin | July 30, 2020 | 0 Comments

अरण्य में राम

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी मंतव्यों वाला लेख है। सुधी पाठकों से आग्रह होगा कि इसके एक-एक शब्द को मननपूर्वक पढ़ें और इसे अधिकाधिक पाठकों तक प्रसारित करें 

 

“वाल्मीकि रामायण” के “अरण्यकांड” में श्रीराम के वनगमन का वर्णन है।

अयोध्या से चलकर श्रीराम ने तमसा नदी लांघी थी और सिंगरौर में “केवट-प्रसंग” हुआ था। कुरई गांव होते हुए वे प्रयाग पहुंचे थे। फिर वे चित्रकूट पहुंचे, जहां “भरत-मिलाप” हुआ। सतना में अत्रि ऋषि के आश्रम के समीप “रामवन” में ठहरे। फिर “दंडक वन” चले गए, जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों को मिलकर बना था। भद्राचलम से वे नासिक में “पंचवटी” पहुंचे। यहीं सर्वतीर्थ में खर-दूषण का वध किया। यहीं “सीता-हरण” हुआ। यहीं पर जटायु का अंतिम संस्कार किया गया था। यहां से सीता-शोध में पर्णशाला गए, तुंगभद्रा और कावेरी नदी घाटी में शबरी के जूठे बेर खाए, ऋष्यमूक पर्वत पर बाली का वध किया, हनुमान और सुग्रीव के साथ मिलकर “वानर-सेना” बनाई और रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करने के बाद “धनुषकोटि” से लंका की ओर प्रस्थान कर गए।

यह समूचा राम गमन पथ है।

श्रीराम एक पौराणिक चरित्र हैं या ऐतिहासिक व्यक्तित्व, इसके पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्कों की एक लम्बी शृंखला प्रवाहित होती रही है।

1990 के दशक में सीताराम गोयल और रामस्वरूप की अगुवाई में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए हिंदू मंदिरों पर शोध किया गया था। दो खंडों में प्रकाशित उस शोध में एक विशेष अध्याय रामजन्मभूमि पर भी था, जिसमें ठोस साक्ष्यों के साथ यह सिद्ध किया गया था कि प्रभु श्रीराम का जन्म उसी स्थल पर हुआ था, जहां रामलला विराजित हैं।

लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में चलाए गए “रामजन्मभूमि आंदोलन” के पीछे सीताराम गोयल और रामस्वरूप के द्वारा दिए गए तर्कों का अत्यंत महत्व था, क्योंकि रोमिला थापर जैसी धुरंधर मार्क्सवादी इतिहासकार भी इनके द्वारा दिए गए तर्कों के सम्मुख निरुत्तर हो गई थीं और दो खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक में उस प्रश्नोत्तरी को भी सम्मिलित किया गया है।

जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो यह विचार उनके मन में आया कि “रामजन्मभूमि” की तरह वह समस्त भूभाग भी भारतवासियों के लिए आस्था का केंद्र है, जहां-जहां वनगमन के दौरान प्रभु श्रीराम के चरण पड़े।

यह प्रस्ताव रखा गया कि देश के समस्य राज्य अपने-अपने क्षेत्रों में पड़ने वाले “राम वनगमन पथ” की शोध करें और एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें।

इसके बाद केंद्र में सरकार बदल गई और अटलजी विस्मृति के अंतरालों में खो गए।

जिन-जिन राज्यों में भाजपा सरकार नहीं थी, वहां पर इस प्रस्ताव की अनदेखी कर दी गई। किंतु भाजपा सरकारों वाले राज्यों ने अटलजी के इस प्रस्ताव को उनके प्रधानमंत्री नहीं रहने के बावजूद स्वीकार किया और इस प्रकार “राम वनगमन पथ” के शोध का यज्ञ आरम्भ हुआ।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2007 में चित्रकूट से “राम वनगमन पथ” में पड़ने वाली मध्यप्रदेश की भूमि के शोध की घोषणा की। यह शोध चित्रकूट से लेकर अमरकंटक तक दंडकारण्य वनक्षेत्र में निष्पादित होना था।

ऐसा माना जाता है कि अपनी वनगमन यात्रा के दौरान प्रभु श्रीराम मध्यप्रदेश के सतना, रीवा, पन्ना, छतरपुर, शहडोल और अनूपपुर ज़िलों से होकर गुज़रे थे। शोधदल का ध्यान इन्हीं ज़िलों पर केंद्रित था।

वर्ष 2008 में संस्कृति विभाग ने एक बैठक बुलाई, जिसमें 11 विद्वानों की समिति बनाकर “राम वनगमन पथ” योजना पर शोध का काम आरम्भ किया गया। तत्कालीन धर्मस्व न्यास मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा को इस योजना का प्रभार सौंपा गया।

दो चरणों में चले सर्वेक्षण के तहत इतिहास, पुरातत्व और रामकथा के इन 11 विद्वानों ने मार्च 2009 से दिसंबर 2010 तक “राम वनगमन पथ” का शोध किया।

इस दल में नर्मदायात्री अमृतलाल वेगड़ सहित अवधेश प्रताप पांडे, भोपाल के रामचंद्र तिवारी, उज्जैन के बालकृष्ण शर्मा, रामसुमन पांडे, ग्वालियर के आर. सी. शर्मा प्रभृति विद्वान सम्मिलित थे।

भोपाल के ही प्रो. आनंद कुमार सिंह (Aanand Singh) भी उस 11 सदस्यीय दल में सम्मिलित थे। वे तंत्र, ज्योतिष और साहित्य के गहन अध्येता हैं। वे अपने साथ “वाल्मीकि रामायण” की प्रति ले गए थे और वाल्मीकि द्वारा वर्णित भूक्षेत्र का मिलान करते जा रहे थे।

उन्होंने आश्चर्यजनक समानताएं पाईं। कई स्थानों पर तो हूबहू वही दृश्यचित्र, जो कि वाल्मीकि द्वारा वर्णित था।

मई 2018 में प्रकाशित प्रो. आनंद कुमार सिंह के एक लेख में यह पंक्तियां आती हैं-

“​वाल्मीकि ने यद्यपि उत्तम पुरुष में यात्राओं का वर्णन नहीं किया, परंतु क्या राम का वनपथ आदि कवि ने घूमा न होगा? राम की यात्रा भारतीय मानस की यात्रा है। लोक-मानस से जुड़ाव और लोक-संवेदना की पहचान इस लोक-गाथा में यों ही नहीं समाहित हो सकी है। आज से नौ-दस साल पहले “राम वनगमन पथ” की खोज करते समय मैं वाल्मीकि के रामायण वर्णनों का मिलान करते हुए सतना जिले में शरभंग मुनि के आश्रम की खोज में भटक रहा था। तब मुझे लगा कि बिना इन दिशाओं में पैर पटके कोई इन बातों को हूबहू कैसे लिख सकता है! वाल्मीकि का “अरण्यकांड” आदिकवि का निजी वनपथ ही है, जो राम के माध्यम से जी उठा है।”

वाल्मीकि के अनुसार भगवान राम ने मध्यप्रदेश में सतना के जंगलों में बहुत समय बिताया था। लगभग दस-ग्यारह सालों का प्रवास। शरभंग ऋषि के आश्रम में ही उन्हें सुतीक्ष्ण मुनि के बारे में पता चला, जो उनके आगमन की बाट ही जोह रहे थे।

वर्ष 2010 में दूसरी सर्वेक्षण यात्रा के बाद शोधदल ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सबमिट कर दी।

दुर्योग ही रहा कि उसके बाद किन्हीं कारणों से श्री लक्ष्मीकांत शर्मा अपने पद पर नहीं रहे और वह रिपोर्ट धर्मस्व मंत्रालय की फ़ाइलों में कहीं खोकर रह गई, उस शोध पर फिर कोई कार्य नहीं किया जा सका।

मेरी निजी राय में “राम वनगमन पथ” के शोध सम्बंधी वह फ़ाइल एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।

उसका महत्व सीताराम गोयल और रामस्वरूप द्वारा 1990 के दशक में दो खंडों में लिखे गए उस ग्रंथ से कम नहीं है, जिसमें हिंदू धर्मस्थलों और विशेषकर रामजन्मभूमि के सम्बंध में प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे।

मैं केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार से अनुरोध करूंगा कि उस रिपोर्ट को प्रकाश में लाकर शोध में प्राप्त हुई निष्पत्तियों पर आगे काम किया जाए और लोकवृत्त में श्रीराम के यात्रापथ के सम्बंध में सुस्पष्ट साक्ष्यों की स्थापना की जाए।

वामपंथी बंधुओं द्वारा इस प्रकार के किसी भी कार्य को “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” कहकर पुकारा जाएगा, किंतु स्मरण रहे कि यूनान में ज़ीयस देवता के गुह्यस्थल की खोज करने वाले विद्वान “आर्कियोलॉजिस्ट” कहलाकर समादृत होते हैं। यह पुरातत्व का विषय है। भारत-भावना और लोकमानस से इसका गहरा सम्बंध है। इसे प्रकाश में आना ही चाहिए। प्रो. आनंद कुमार सिंह तो अपने अनुभवों के आधार पर पृथक से एक पुस्तक इस विषय पर लिख ही रहे हैं।

किंतु कौन जाने, राज्यसत्ता को यह अवसर फिर मिले ना मिले। उस तक यह संदेश पहुंचाया जाना आवश्यक है।

श्रीरामजानकी की मंगलमूर्ति समस्त चराचर विश्व पर अनुकम्पा करे, यही मंगलकामना।

 

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