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admin | November 3, 2020 | 0 Comments

वामनभगवान और राजा बलि कथा

प्रजापति कश्यप की दो पत्नियां थी। एक का नाम था दिति और दूसरी का अदिति। अदिति की संतान देवता(सुर) थे और दिति की संतान थे दैत्य यानि असुर। वे दोनों बात -बात पर आपस में लड़ते -झगड़ते रहते थे। देवासुर – संग्राम पुराणों में प्रसिद्ध है।

देवताओं के गुरु थे आचार्य बृहस्पति और दैत्यों के गुरु थे शुक्राचार्य। इन दोनों के विचारों में मित्रता थी।

एक बार दोनों पक्षों में घोर युद्ध हुआ। युद्ध में असुर हार गए , परन्तु आचार्य शुक्र ने संजीवनी विद्द्या दैत्यों को जीवित कर दिया। संजीवनी विद्या को संजीवनी – वाणी भी कहा गया है। आचार्य शुक्र की वाणी में ओजस भी था और तेजस भी। रणभूमि हारे हुए दैत्यों में अपनी वाणी से आचार्य शुक्र ने ओजस और तेजस ( साहस ) का संचार कर दिया , उन्होंने मुर्दों में जान फूंक दी। वे फिर से चौगुने साहस और वीरता के साथ देवताओं से लड़े और उनको परास्त कर दिया। देवराज इंद्र अपनी नगरी छोड़कर भाग गए। बाकी बचे देवता असुरों के भय से मारे – मारे फिरने लगे।

एक दिन कश्यप जी महाराज अपनी अदिति स्त्री के आश्रम पर गए थे। और अदिति जी उदास हैं। तो अदिति जी से कश्यप जी ने पूछा की आप उदास क्यों है?

अदिति जी कहती है मेरे पुत्र देवता सुखी नहीं हैं। दैत्यों ने उनसे स्वर्ग की राजलक्ष्मी छीन ली है।

कश्यप जी ने अपनी पत्नी को पयोव्रत नाम का व्रत बताया है। तुम इस व्रत को करो तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी।

अदिति ने फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन पयोव्रत करके भगवान की आराधना की। प्रभु प्रकट हुए। भगवान बोले की आप वर मांगिये।

इन्होने भगवान से माँगा की आप मेरे गर्भ से प्रकट होइए। भगवान ने तथास्तु कहा।

अदिति को वरदान मिला। उन्हीं के गर्भ से भगवान प्रकट हुए। शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज पुरुष अदिति के गर्भ से जब प्रकट हुए,

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि और श्रवण नक्षत्र के अभिजित मुहूर्त में भगवान वामन बनकर प्रकट हो गए हैं। बौने ब्राह्मण के रूप में अवतार लेने के कारण इनका नाम वामन हुआ है। इसी दिन को “वामन जयंती”के नाम से जाना जाता है

वामन विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। इसके साथ ही यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए। इनको दक्षिण भारत में “उपेन्द्र” के नाम से भी जाना जाता है। तत्काल वामन ब्रह्मचारी बन गये।

महर्षि कश्यप ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार करते हैं। वामन बटुक को महर्षि पुलह ने यज्ञोपवीत, अगस्त्य ने मृगचर्म, मरीचि ने पलाश का दण्ड, आंगिरस ने वस्त्र, सूर्य ने छत्र, भृगु ने खड़ाऊँ, गुरु देव जनेऊ तथा कमण्डल, अदिति ने कोपीन, सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला तथा कुबेर ने भिक्षा पात्र प्रदान किए। तत्पश्चात भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं। उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अन्तिम यज्ञ कर रहे होते हैं।

भगवान उस दिव्य श्रृंगार को धारण कर अपने गुरु बृहस्पति जी की आज्ञा से माँ पार्वती से भिक्षा लेकर नर्मदा के उत्तर तट पर गए हैं। वहां पर राजा बलि अंतिम अश्वमेध यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं।

असुर राजा बलि, राजा विरोचन के पुत्र थे और भक्त प्रहलाद के पौत्र थे। भगवान के वे बड़े भक्त भी थे। राजा बली बड़े पराक्रमी और दानी थे। देवताओं पर चढ़ाई करने राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि को इतिहास में एक दानवीर शासक के रूप में जाना जाता हैं। राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। सम्पूर्ण पृथ्वी को जितने के लिए ये अंतिम अश्वमेध यज्ञ की तैयारी कर रहे थे।

तभी वामन भगवान राजा बलि के पास आये हैं। राजा बलि ने इनका खूब आदर-सत्कार दिया है। बलि ने कहा- हे ब्राह्मण के बेटा! आप मेरे द्वार पर आये हैं। आपको क्या चाहिए?

बलि के कुल की शूरता, उदारता आदि की प्रशंसा करके वामन ने माँगा। मैं तेरे द्वार पर 3 पग पृथ्वी मांगने के लिए आया हूँ।

राजा बलि ये बात सुनकर हंसने लगे और कहते हैं- आप जानते हो की आप किसके द्वार पर खड़े हो? मैं एक चक्रवर्ती राजा हूँ। और मैं आज प्रसन्न हूँ। इतनी छोटी सी भूमि लेकर क्या करोगे?

वामन जी कहते हैं- छोटी सी कुटिया बनाकर भगवान का भजन करूँगा।

राजा बलि कहते हैं- तुमको एक दूध पीने के लिए गऊ दे दूँ। या और कुछ दे दूँ। महाराज और कोई बड़ा दान माँग लीजिए।

वामन जी कहते हैं- राजा बलि! हम बहुत संतोषी ब्राह्मण हैं। हमें बस 3 पग पृथ्वी दे दो।
राजा बलि कहते हैं- लेकिन आप कुछ ज्यादा नही ले सकते हैं। बलि ने बहुत आग्रह किया कि और कुछ माँगा जाय।

वामन जी बोले- राजा बलि! मुझे लग रहा है तुम देना नहीं चाहते हो, मैंने तुम्हारे दादा(प्रल्हाद जी) की प्रशंसा की। आपके पिता की बड़ाई की। लेकिन अब मैं यहाँ से लौट के जा रहा हूँ।

राजा बलि कहते हैं- हे ब्राह्मण देव! आप क्रोध ना कीजिये। मैं आपको 3 पग पृथ्वी दान देने का वचन देता हूँ।

अब तक शुक्राचार्य जी यज्ञ के काम में लगे हुए थे। ये बलि के गुरु और पुरोहित हैं।

राजा बलि ने शुक्राचार्य जी को कहा की- महाराज! आप भी ब्राह्मण हैं। और ये भी ब्राह्मण बालक हैं। ये बालक मुझसे 3 पग पृथ्वी की याचना कर रहा है। तो शुक्राचार्य जी ने अपने यज्ञ कार्यों से से दृष्टि हटकर सिंह द्वार की और देखा, तो राजा बलि से पूछते हैं- ये कौन हैं?

राजा बलि बोले-ये ब्राह्मण के पुत्र हैं।

शुक्राचार्य जी कहते हैं- ये किसी के पुत्र नही हैं बल्कि सबके बाप हैं। तेरे द्वार पर साक्षात नारायण खड़े हैं। जानते हो ये 3 पग पृथ्वी इसलिए मांग रहे हैं। एक पग में ऊपर के सब लोक नाप लेंगे। दूसरे पग में नीचे के लोग माप लेंगे। और जब तीसरे पग पृथ्वी नही बचेगी तो तुझे नरक में डाल देंगे।

राजा बलि ने कहा- गुरुदेव! अगर ये भगवान हैं तब तो में तीन पग पृथ्वी जरूर दान करूँगा। क्योंकि मैं तो एक लोक का राजा हूँ और ये तीनों लोक के राजा आज मुझसे मांगने आये हैं। तब शुक्राचार्य ने राजा बलि को ऐश्वर्य-नाश का शाप दे दिया।

राजा बलि बोले चाहे कुछ भी हो जाये मैं आज दान देकर रहूँगा।

तभी अपनी पत्नी विन्ध्यावली जी को बुलाया। और वो जल की झारीं भर कर लाइ हैं। लेकिन शुक्राचार्य जी से नही देखा गया।

शुक्राचार्य जी उस कमण्डलु में छोटा रूप धारण करके बैठ गए। क्योंकि शुक्राचार्य जी जानते हैं संकल्प बोला जायेगा। और उसके लिए जल की आवश्यकता होगी। लेकिन जब जल ही नही आएगा तो संकल्प कहाँ से भरा जायेगा। और यदि आज भगवान ने राजा बलि से सब ले लिए तो यजमान भी लूट गया और पुरोहित भी।

तो मैं कमण्डलु से बाहर पानी निकलने ही नही दूंगा। और एक आँख कमण्डलु की टोंटी में लगा ली। ताकि जो बाहर हो रहा है सब देखते रहें।

पानी लेने के लिए जब कमण्डलु को टेढ़ा किया तो उसमें से पानी नही निकला। भगवान तो सब जानते हैं की शुक्राचार्य जी लघु रूप धारण करके बैठे हैं। बार बार कमण्डलु को टेढ़ा करते हैं लेकिन पानी नही आता है। भगवान बोले की राजा बलि ऐसा लगता है की कमण्डलु के रास्ते में कुछ अटक गया है। भगवान ने अपने कुशा के आसन से 2 तीलियाँ निकाली और कहा – ले रास्ता साफ़ करले।

जैसे ही कमण्डलु की टोंटी में जो तिल्ली डाली तो शुक्राचार्य की एक आँख लगी थी वो ही फुट गई।

शुक्राचार्य बोले- आज बलि के कारण हमने अपनी एक आँख को भी फ़ुड़वा लिया। अब चाहे राजा बलि का सब कुछ लूट जाये हम एक शब्द भी नही बोलेंगे।

कमण्डलु से पानी बाहर निकला। भगवान ने राजा बलि से संकल्प भरने के लिए कहा। राजा बलि कहते हैं मेरे इस दान से भगवान नारायण प्रसन्न हो जाएँ।

इतना सुनते ही भगवान का मन गदगद हो गया। और बोलते हैं आज तू मेरे लिए भूमि दान कर रहा है मेरी ही ख़ुशी के लिए। तो ख़ुशी में कौन बड़ा नही होता है। आज भगवान वामन से विराट बन गए हैं।

एक पग में ऊपर के सब लोक नाप लिए और दूसरे पग में नीचे के सब लोक नाप लिए। जब तीसरा पग पृथ्वी नही बची तो राजा बलि को पाश में बाँध लिया और कहते हैं- राजा मुझे तीसरे पग पृथ्वी दान कर। नही तो तुझे नरक में डाल दूंगा।

राजा बलि ने कहा- ये बार-बार आप नरक का डर क्यों दिखाते हो। क्या आपके पास इससे बड़ी जगह है? अगर आपके पास नरक से भी बड़ी जगह है तो आप मुझे उसमें डाल दें।

क्या आप इसी भेष से मेरे द्वार पर मांगने के लिए आये थे?

वामन जी कहते हैं- क्या में बदल गया हूँ।

बलि कहते हैं- आप तो इतने लम्बे चौड़े हो गए हैं की कोई दान लेने के बाद हुआ ही नही होगा। यदि आप फिर से वामन बन जाएँ तो में अपने वचन को पूरा कर दूंगा और आपको तीसरे पग पृथ्वी दान कर दूंगा।

राजा बलि की प्रार्थना पर भगवान फिर विराट से वामन बन गए हैं। और राजा बलि से कहते हैं मुझे तीसरे पग पृथ्वी का दान कर। राजा बलि ने कहा- मैंने आपके विराट रूप में सबको देखा। अपने परिवार को देखा, अपनी पत्नी को देखा, अपने बच्चो को देखा। अपने राज्य को देखा, अपनी सेना को देखा लेकिन मैंने अपने आप को कहीं नही देखा। प्रभु जब आपने मेरा सर्वस्व ले लिया तो मुझे क्यू छोड़ा?

आप अपना तीसरा पग उठाइये और मेरे शीश पर अपना तीसरा पग रख दीजिये और मुझे भी दान स्वरूप आप ले लीजिये। कहीं ऐसा ना हो की आपके भक्त का वचन असत्य हो जाये।

राजा बलि भगवान के चरणो में झुक गए और भगवान ने अपना चरण राजा बलि के मस्तक पर रखा और कहा राजा- ‘तुम अगले मन्वन्तर में इन्द्र बनोगे! अब तुम अपने परिवार को लेकर सुतल लोक(पाताल लोक) चले जाओ।

राजा बलि जा रहे हैं। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर लौटकर भगवान के पास आये हैं।

भगवान बोले की क्यों लौटकर आये हैं आप? क्या आपकी जाने की इच्छा नही है?

बलि बोले- जाने की तो आपकी आज्ञा है। लेकिन आपका रूप देखकर मेरी आपके सामने से हटने की इच्छा नही हो रही है। आप ये बताइये आपके इस वामन रूप का अब दर्शन कब होगा?

भगवान कहते हैं- राजा बलि तूने मुझे अपना तन दिया, मन दिया और धन दिया। क्या मैं आपने वामन रूप तुझे नही दे सकता हूँ?

भगवान ने कहा- राजा बलि! मैं तुझसे आज प्रतिज्ञा करता हूँ। जहाँ तू सुतल लोक में रहेगा वहां तेरे द्वार पर इस वामन भेष में हाथ में गदा लेकर तेरे द्वार पर हमेशा हमेशा के लिए तेरा चौकीदार बनकर खड़ा रहूँगा। जब तू राजमहलों से भर निकलेगा तब-तब तू मेरे इस वामन रूप का दर्शन करेगा।

ब्रह्मा जी ने भगवान वामन को ‘उपेन्द्र’ पद प्रदान किया। वे इन्द्र के रक्षक होकर अमरावती में अधिष्ठित हुए। भगवान बलि के द्वार पर गदापाणि द्वारपाल तो बन ही चुके थे। त्रेता युग में दिग्विजय के लिये रावण ने सुतल-प्रवेश की धृष्टता की। बेचारा असुरेश्वर के दर्शन तक न कर सका। बलि के द्वारपाल ने पैर के अँगूठे से उसे फेंक दिया। वह पृथ्वी पर सौ योजन दूर लंका में आकर गिरा था।

सुतल लोक में वामन भगवान आज भी राजा बलि के यहाँ द्वार पर गदा लेकर खड़े हुए हैं। इस प्रकार से प्रभु ने अपने भक्त के संकल्प को पूरा किया है।

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