Blog

admin | July 27, 2020 | 0 Comments

मंथन जरूरी है (अहंकार, क्रोध ओर पछतावा )

अहंकार का फल क्रोध और क्रोध का फल पछतावा है.अहंकार से बचने का एक उपाय, अपने सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर दिजीए और अहंकार से मुक्ति पाइए. आइये अहंकार के फल को एक श्रीरामचरितमानस मानस के एक प्रसंग से समझने की कोशिश करते हैं.

एक बार की बात है श्री नारद जी तपस्या कर रहे थे ,परंतु स्वर्ग के राजा इंद्र को डर लग रहा था कि कहीं श्री नारद जी अपने तपस्या से स्वर्ग लोक ना प्राप्त कर लें. इसलिए श्री नारद जी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव को भेजे , परंतु कामदेव, श्री नारद जी की तपस्या को भंग नहीं कर सका और पराजित होकर भाग गया. इसके बाद नारद जी को अहंकार हो गया कि मैं कामदेव को परास्त कर दिया जब कि देवों के देव महादेव कामदेव से हार गये थे.

श्री नारद जी अपने अहंकार को लेकर ब्रह्मा जी के पास गये और ब्रह्मा जी को बताए कि कैसे कामदेव को परास्त कर दिए. ब्रह्मा जी नारद जी को समझाते हुए कहा कि मुझे तुम अपने अहंकार की चर्चा की हो परंतु कभी भी शिव जी से मत बताना. परंतु नारद जी शिव जी के पास गये और लगभग शिव जी का मजाक उड़ाते हुए कहे कि आप तो कामदेव से हार कर माता पार्वती से शादी कर लिए. मैं तो कामदेव को हरा दिए.

शिव जी तो सब जानते हैं.वह नारद जी को चेतावनी देते हुए कहे कि हे आप ने मुझे बताया कोई बात नहीं परंतु श्री विष्णु जी को कभी भी मत बताईएगा. परंतु नारद जी शिव जी के सलाह को अनसुना करते हुए श्री विष्णु जी को भी बता दिए.श्री विष्णु जी ने सोचा कि हमारा भक्त अहंकार से पिड़ित है इसको अहंकार से मुक्ति दिलाना हमारा कर्तव्य है.

श्री विष्णु श्री नारद जो सबक सिखाने के लिए अपने माया से एक मायानगरी बसाये.उस माया नगरी के राजा अपने महा सुंदरी बेटी के लिए वर ढुंढ़ने के लिए स्वंयबर का आयोजन किए और श्री विष्णु जी अपने प्रेरणा से नारद जी को संदेश दिए कि आप भी स्वंयवर में जाइये क्यों कि आप के योग्य कन्या है. नारद जी श्री विष्णु की लीला को समझे बिना ,पता किए कि स्वयंबर का शर्त क्या है? मालुम हुआ कि शादी उसी से होगा जो विश्व का सबसे सुंदर होगा. नारद जी ,श्री विष्णु के पास गये और बोले कि स्वंयबर का शर्त के मुताबिक आप मुझे विश्व का नंबर वन बर बना दिजीए जो विश्व सुंदर हो.

श्री विष्णु जी बोले कि नारद जी आप मेरे भक्त है.आप का जिसमें भलाई होगा, वही रूप दे रहा हूँ . जाओ निश्चित ही कन्या आप का ही चुनाव करेगी. नारद जी स्वंयबर में गये परंतु कन्या नारद जी को पसंद नहीं की. जब नारद जी स्वयंबर से बाहर निकल रहे थे , तो महल के गेट पर जय और विजय नामक द्वारपाल, नारद जी को देखकर हंस दिए .जब नारद उनके हंसने का कारण पुछे तो जय और विजय एक साथ बोले कि आप “बंदर” का रूप लेकर स्वयंबर में आये थे, आप को कौन वेवकूफ लड़की चुनाव करेगी . नारद जी, जय और विजय को श्राप दिए कि जाओ राक्षस बन जाओ और तुम्हें मारने के लिए श्री विष्णु को मानव रूप धारण करना पड़ेगा.

नारद जी आगबबूला होकर नारद जी श्री विष्णु जी के पास जाकर उन्हें श्राप दिए कि “हे छलिया, आप ने मुझे छला है.जिस प्रकार मैं पत्नी के लिए तड़प रहा हूँ, आप भी ऐसे ही पत्नी वियोग मे तड़पेंगे और जिस बंदर का मुंह आप ने मुझे दिए हैं वही बंदर आप की पत्नी को मिलाने सहायक होंगे. श्री विष्णु बोले कोई बात नहीं ,यही विधि का विधान है. आप जय और विजय को श्राप दिए हैं कि राक्षस बन जाओ, मैं उन दोनों को राक्षस योनि से मुक्ति के लिए मानव शरीर धारण करूंगा.

श्री नारद जी का क्रोध शांत हो गयागया और बहुत ही पछताए कि मेरे मुंह से श्री हरि के लिए श्राप निकल गया. श्री विष्णु ने कहा कि मैं आप के इस कृत्य के लिए आप को माफ कर रहा हूँ क्यों कि आप के अहंकार को खत्म करने के लिए मेरे ही माया ने सब कुछ कराया है. विधि का यही विधान था.

हमारा अहंकार हमें क्रोध दिलाती है और क्रोध हम ना करने वाला कर्म भी कर जाते हैं. उसके बाद केवल पछतावा ही बचता है परंतु अहंकार और पछतावा के बीच बहुत ही अमंगल हो जाता है जो नहीं होना चाहिए था. सदा अहंकार से बचना चाहिए इसके लिए अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करते रहिए.हमारा सभी कर्म भगवान अपने हाथों से कर रहे हैं.हम तो मात्र उनके कर्म का साधन हैं.कर्म करने का यही सर्वश्रेष्ठ कारण है.

Leave a Comment

Your email address will not be published.